The Silent Salt Epidemic: भारत में बढ़ता बीमारियों का खतरा

The Silent Salt Epidemic: भारत में बढ़ता बीमारियों का खतरा

भारत एक ऐसे अदृश्य खतरे की चपेट में है जिसे ‘साइलेंट सॉल्ट एपिडेमिक’ या ‘खामोश नमक महामारी’ का नाम दिया जा रहा है। अत्यधिक नमक का सेवन चुपचाप लाखों भारतीयों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है, जिससे कई गंभीर बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सिफारिशों से कहीं अधिक नमक का सेवन, भारतीय आहार का एक अभिन्न अंग बन गया है, जिसके दीर्घकालिक और हानिकारक परिणाम सामने आ रहे हैं।

अधिक नमक क्यों है खतरनाक?

Why is excess salt dangerous?

नमक, सोडियम का मुख्य स्रोत है, जो शरीर के सामान्य कार्यों के लिए आवश्यक है। हालांकि, इसकी अधिकता शरीर पर विनाशकारी प्रभाव डाल सकती है:

  • उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure): यह अत्यधिक नमक के सेवन का सबसे सीधा और खतरनाक परिणाम है। शरीर में अतिरिक्त सोडियम पानी को बनाए रखता है, जिससे रक्त वाहिकाओं पर दबाव बढ़ता है और उच्च रक्तचाप होता है। उच्च रक्तचाप हृदय रोग, स्ट्रोक और गुर्दे की बीमारियों का एक प्रमुख जोखिम कारक है।
  • हृदय रोग (Heart Disease): उच्च रक्तचाप के कारण हृदय को रक्त पंप करने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है, जिससे समय के साथ हृदय की मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं। यह दिल के दौरे, दिल की विफलता और अन्य हृदय संबंधी समस्याओं को जन्म दे सकता है।
  • स्ट्रोक (Stroke): उच्च रक्तचाप मस्तिष्क को रक्त पहुंचाने वाली धमनियों को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे रक्त के थक्के बन सकते हैं या रक्त वाहिकाएं फट सकती हैं, परिणामस्वरूप स्ट्रोक हो सकता है।
  • गुर्दे की बीमारी (Kidney Disease): गुर्दे शरीर से अतिरिक्त सोडियम और पानी को निकालने का काम करते हैं। अत्यधिक नमक का सेवन गुर्दों पर अतिरिक्त दबाव डालता है, जिससे उनकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है और धीरे-धीरे गुर्दे खराब हो सकते हैं।
  • ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis): कुछ शोध बताते हैं कि अत्यधिक सोडियम का सेवन कैल्शियम के उत्सर्जन को बढ़ा सकता है, जिससे हड्डियों की कमजोरी और ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा बढ़ सकता है।
  • पेट का कैंसर (Stomach Cancer): कुछ अध्ययनों ने अत्यधिक नमक के सेवन और पेट के कैंसर के बढ़ते जोखिम के बीच संबंध दिखाया है।
  • पानी प्रतिधारण और सूजन (Water Retention and Swelling): शरीर में अतिरिक्त सोडियम पानी को खींचता है, जिससे शरीर में सूजन, खासकर पैरों और टखनों में सूजन हो सकती है।

भारत में समस्या की जड़ें

The roots of the problem in India

भारत में ‘Silent Salt Epidemic’ के कई कारण हैं:

  • संसाधित और पैकेज्ड खाद्य पदार्थ: नमकीन स्नैक्स, इंस्टेंट नूडल्स, सॉस, अचार, और डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ भारतीय आहार का एक बड़ा हिस्सा बन गए हैं, और इनमें अक्सर उच्च मात्रा में छिपा हुआ नमक होता है।
  • पारंपरिक खाद्य पदार्थ: कई पारंपरिक भारतीय व्यंजन, जैसे अचार, चटनी, पापड़ और नमकीन, स्वाभाविक रूप से उच्च नमक सामग्री वाले होते हैं।
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  • खाद्य पदार्थों में स्वाद बढ़ाने के लिए नमक का उपयोग: घरों और रेस्तरां में खाना बनाते समय अक्सर स्वाद बढ़ाने के लिए अधिक नमक का उपयोग किया जाता है।
  • जागरूकता की कमी: आम जनता में अत्यधिक नमक के सेवन से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों के बारे में जागरूकता की कमी है।
  • उत्पाद लेबलिंग: कई उपभोक्ताओं को खाद्य लेबल पढ़ने और सोडियम सामग्री को समझने में कठिनाई होती है।
क्या करें? समाधान की दिशा में कदम

इस ‘साइलेंट एपिडेमिक’ से निपटने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है:

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  • जागरूकता बढ़ाना: सरकार, स्वास्थ्य संगठन और मीडिया को मिलकर अत्यधिक नमक के सेवन के खतरों के बारे में सार्वजनिक जागरूकता अभियान चलाने चाहिए।
  • संसाधित खाद्य पदार्थों पर नियंत्रण: खाद्य उद्योग को अपने उत्पादों में सोडियम की मात्रा कम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। सख्त नियम और मानक इसमें मदद कर सकते हैं।
  • खाद्य लेबलिंग में सुधार: उपभोक्ताओं के लिए सोडियम सामग्री को समझना आसान बनाने के लिए स्पष्ट और सरल लेबलिंग आवश्यक है।
  • घर पर नमक का सेवन कम करें: खाना बनाते समय नमक का उपयोग कम करें। प्राकृतिक जड़ी-बूटियों, मसालों और नींबू का उपयोग स्वाद बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।
  • ताजा भोजन को प्राथमिकता दें: प्रसंस्कृत और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के बजाय ताजे फल, सब्जियां, साबुत अनाज और लीन प्रोटीन का सेवन बढ़ाएं।
  • बाहर खाने पर ध्यान दें: रेस्तरां में भोजन करते समय कम नमक वाले विकल्पों का अनुरोध करें।
  • नियमित स्वास्थ्य जांच: नियमित रूप से रक्तचाप की जांच करवाएं और यदि आवश्यक हो तो डॉक्टर से सलाह लें।

‘साइलेंट सॉल्ट एपिडेमिक’ एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। व्यक्तिगत स्तर पर जागरूकता और व्यवहार परिवर्तन के साथ-साथ नीतिगत हस्तक्षेप और खाद्य उद्योग की जिम्मेदारी ही भारत को इस अदृश्य खतरे से बचा सकती है और एक स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित कर सकती है।

 

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